ज्योतिष के शब्द
ज्योतिष के शब्द, आसान भाषा में
इस साइट पर इस्तेमाल होने वाले हर शब्द को यहाँ एक-दो सीधे वाक्यों में समझाया गया है। आपको ये सब याद करने की ज़रूरत नहीं है। जब भी कोई शब्द नया लगे, यहाँ लौट आइए।
आपकी जन्म कुंडली
- कुंडली (जन्म कुंडली, जन्मपत्री)
- जिस पल और जिस जगह आपका जन्म हुआ, उस समय के आकाश का नक्शा। ज्योतिषी इसी से आपके जीवन को पढ़ते हैं। इसे होरोस्कोप भी कहते हैं।
- राशि (चंद्र राशि)
- आपके जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में था। भारत में “आपकी राशि” का मतलब आम तौर पर आपकी चंद्र राशि होता है।
- लग्न (उदय राशि)
- जिस पल आपका जन्म हुआ, उस पल पूर्व दिशा में उदय हो रही राशि। यह लगभग हर दो घंटे में बदल जाती है, इसलिए इसके लिए आपका जन्म समय चाहिए। कुंडली के भाव इसी से गिने जाते हैं।
- ग्रह
- भारतीय ज्योतिष के नौ “ग्रह” (नवग्रह): सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु (बृहस्पति), शुक्र, शनि, राहु और केतु।
- राहु और केतु
- आकाश में वे दो बिंदु, जहाँ चंद्रमा का रास्ता सूर्य के रास्ते को काटता है। ये असली ग्रह नहीं हैं, लेकिन ज्योतिष इन्हें ग्रह मानता है और छाया ग्रह कहता है।
- राशिचक्र की राशि
- आकाश बारह राशियों में बँटा है, मेष से मीन तक। हर ग्रह किसी भी समय किसी एक राशि में होता है।
- भाव (घर)
- कुंडली बारह भावों में बँटी होती है। हर भाव जीवन के किसी एक हिस्से से जुड़ा होता है, जैसे पैसा (2रा भाव), शादी (7वाँ भाव) या करियर (10वाँ भाव)।
- नक्षत्र (जन्म नक्षत्र)
- आकाश 27 तारा-समूहों में भी बँटा है। आपके जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका नक्षत्र है।
- चरण या पाद (नक्षत्र का चौथाई हिस्सा)
- हर नक्षत्र के चार हिस्से होते हैं, जिन्हें चरण या पाद कहते हैं। हर चरण की एक ध्वनि होती है, जिसे कई परिवार बच्चे के नाम का पहला अक्षर रखते हैं।
- वर्ग कुंडलियाँ
- हर राशि को छोटे हिस्सों में बाँटकर बनाई गई अतिरिक्त कुंडलियाँ, D-2 से D-60 तक। हर एक को जीवन के किसी एक क्षेत्र के लिए देखा जाता है। ज़्यादा बारीक कुंडलियों के लिए बहुत सटीक जन्म समय चाहिए।
भाव और उनके स्वामी
- भाव का स्वामी (भावेश)
- बारह भावों में से हर भाव की देखरेख एक ग्रह करता है, जिसे उस भाव का स्वामी (भावेश) कहते हैं। वह ग्रह कहाँ बैठा है और कितना मज़बूत है, इससे पता चलता है कि जीवन का वह हिस्सा कैसा चल रहा है।
- केंद्र (मुख्य भाव)
- 1ला, 4था, 7वाँ और 10वाँ भाव। ये कुंडली के सबसे मज़बूत भाव हैं, और कई योगों के लिए इनमें से किसी एक में ग्रह का होना ज़रूरी है।
- त्रिकोण (शुभ भाव)
- 1ला, 5वाँ और 9वाँ भाव। इन्हें भाग्य और सौभाग्य के भाव माना जाता है।
- दुःस्थान (कठिन भाव)
- 6ठा, 8वाँ और 12वाँ भाव। ये बीमारी, अचानक बदलावों और नुक़सान से जुड़े हैं, इसलिए जो ग्रह इनके स्वामी हैं या इनमें बैठे हैं, उन्हें ज़्यादा सावधानी से पढ़ा जाता है।
- कारक (किसी बात से जुड़ा ग्रह)
- वह ग्रह, जो स्वाभाविक रूप से किसी बात से जुड़ा होता है: जैसे शादी के लिए शुक्र, संतान के लिए गुरु और पिता के लिए सूर्य।
- दृष्टि (ग्रह की नज़र)
- ग्रह जहाँ बैठा होता है, वहाँ से कुछ ख़ास भावों को “देखता” है। हर ग्रह अपने से 7वें भाव को देखता है, और मंगल, गुरु और शनि कुछ दूसरे भावों को भी देखते हैं।
ग्रहों की दशाएँ और चाल
- दशा (ग्रह की अवधि)
- आपका जीवन कई अवधियों में बँटा होता है, और हर अवधि का स्वामी एक ग्रह होता है। परंपरा हर अवधि को उसके ग्रह के हिसाब से पढ़ती है।
- महादशा और अंतर्दशा
- महादशा किसी ग्रह की मुख्य अवधि है, जो 6 से 20 साल तक चलती है। हर महादशा छोटी अवधियों में बँटी होती है, जिन्हें अंतर्दशा कहते हैं।
- गोचर (ग्रहों की चाल)
- ग्रह आज कहाँ चल रहे हैं, और आपकी जन्म कुंडली में वे कहाँ थे, इन दोनों की तुलना।
- साढ़े साती
- वे साढ़े सात साल, जब शनि आपकी चंद्र राशि से पहले वाली राशि, आपकी चंद्र राशि और उसके बाद वाली राशि से गुज़रता है। इसे मेहनत और सीख का समय माना जाता है।
- ढैया (छोटी पनौती)
- वे ढाई साल, जब शनि आपकी चंद्र राशि से 4थी या 8वीं राशि में होता है।
- वक्री (उलटी चाल)
- समय-समय पर कोई ग्रह धरती से देखने पर आकाश में पीछे की ओर चलता हुआ दिखता है। ऐसे ग्रह को वक्री कहते हैं और उसके साथ R का निशान लगाया जाता है। राहु और केतु हमेशा इसी तरह चलते हैं।
- वर्षफल (साल की कुंडली)
- आपके जीवन के एक साल का फलादेश, जो उस साल आपके जन्मदिन के पल के लिए बनी कुंडली से निकाला जाता है।
योग, दोष और ग्रहों का बल
- योग (कुंडली में)
- ग्रहों का एक ख़ास मेल, जिसे पुराने ग्रंथ ताक़त मानते हैं, जैसे राजयोग (पद और मान-सम्मान में बढ़त) या धनयोग (धन-दौलत)।
- दोष
- ग्रहों का ऐसा मेल, जिसे पुराने ग्रंथ कठिनाई मानते हैं, जैसे मंगल दोष या कालसर्प दोष। ग्रंथों में इनके उपाय भी दिए गए हैं।
- मंगल दोष (मांगलिक)
- जब मंगल कुंडली के कुछ ख़ास भावों में बैठा हो। कई परिवार शादी से पहले इसे देखते हैं। ग्रंथ ऐसे कई अपवाद भी बताते हैं, जिनसे यह दोष ख़त्म हो जाता है।
- कालसर्प दोष
- जब सातों ग्रह राहु और केतु के बीच की रेखा के एक ही तरफ़ हों।
- उच्च, स्वराशि, नीच
- जिस राशि में ग्रह सबसे मज़बूत होता है, वहाँ उसे “उच्च” कहते हैं; जो राशि उसकी अपनी है, वहाँ “स्वराशि में”; और जिस राशि में वह सबसे कमज़ोर होता है, वहाँ “नीच”।
- शुभ ग्रह और पाप ग्रह
- परंपरा कुछ ग्रहों को ज़्यादातर सौम्य मानती है (गुरु, शुक्र, और आम तौर पर चंद्र और बुध) और कुछ को ज़्यादातर कठोर (शनि, मंगल, सूर्य, राहु और केतु)।
- अष्टकवर्ग (समर्थन के अंक)
- आपकी कुंडली में हर राशि को कितना समर्थन मिलता है, इसकी गिनती, जिसमें हर ग्रह से 0 से 8 अंक तक मिलते हैं। ज़्यादा अंक का मतलब है जीवन के उस हिस्से को ज़्यादा समर्थन। एक औसत राशि में लगभग 28 अंक होते हैं।
- उपाय
- कोई आसान काम, जिसे परंपरा किसी कठिनाई को हल्का करने के लिए सुझाती है, जैसे किसी को खाना खिलाना, कुछ दान करना या प्रार्थना करना।
- अयनांश
- पश्चिमी और भारतीय राशिचक्र के बीच का अंतर, जो आज लगभग 24 डिग्री है। यह साइट लाहिड़ी अयनांश इस्तेमाल करती है, वही जो ज़्यादातर भारतीय पंचांग इस्तेमाल करते हैं।
हिंदू कैलेंडर (पंचांग)
- पंचांग
- किसी एक दिन और एक जगह का हिंदू कैलेंडर। इसके पाँच अंग हैं: तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार।
- तिथि (चंद्र तारीख़)
- चंद्रमा के हिसाब से तारीख़, जो इस पर निर्भर करती है कि चंद्रमा सूर्य से कितनी दूर है। एक चंद्र महीने में 30 तिथियाँ होती हैं, 15 शुक्ल पक्ष (उजाले वाले पखवाड़े) में और 15 कृष्ण पक्ष (अँधेरे वाले पखवाड़े) में।
- करण
- तिथि का आधा हिस्सा। करण 11 तरह के होते हैं, और इनमें से एक, विष्टि (भद्रा), को शुभ कामों के लिए टाला जाता है।
- योग (पंचांग में)
- पंचांग के 27 योगों में से एक, जो सूर्य और चंद्रमा की स्थितियों को जोड़कर निकाला जाता है। हर योग लगभग एक दिन चलता है। यह कुंडली वाले योग जैसा नहीं है।
- राहु काल
- हर दिन लगभग डेढ़ घंटे का वह समय, जिसमें परंपरा कोई नया काम शुरू करने से बचती है। इसका समय वार और जगह के साथ बदलता है।
- मुहूर्त
- कोई ज़रूरी काम शुरू करने के लिए चुना गया शुभ समय, जैसे शादी, यात्रा या नए घर में जाना (गृह प्रवेश)।
- चौघड़िया
- दिन और रात, दोनों को आठ-आठ हिस्सों में बाँटा जाता है, और हर हिस्से को शुभ, सामान्य या अशुभ बताया जाता है।
कुंडली मिलान और दूसरे तरीक़े
- गुण मिलान (अष्टकूट)
- शादी के लिए कुंडली मिलान का स्कोर, 36 अंकों में से, जो आपसी मेल के आठ पहलुओं से बनता है। परंपरा में 18 या उससे ज़्यादा अंक ठीक माने जाते हैं।
- पोरुत्तम
- दो कुंडलियाँ मिलाने का दक्षिण भारतीय (तमिल) तरीक़ा, जिसमें स्कोर के बजाय दस जाँचें होती हैं।
- लाल किताब
- पिछली सदी की उत्तर भारतीय ज्योतिष की एक किताब, जिसके अपने नियम हैं और जिसमें आसान, सस्ते उपाय दिए गए हैं।
- केपी (कृष्णमूर्ति पद्धति)
- एक सटीक तरीक़ा, जो ख़ास सवालों के जवाब के लिए आकाश को 249 छोटे हिस्सों में बाँटता है। इसके लिए सटीक जन्म समय चाहिए।